हम हैं हिंदुस्तानी

मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिस्तानी, सर पर लाल टोपी रूसी ,फिर भी दिल है हिंदुस्तानी ।
फिल्म श्री 420 के लिए यह अमर गीत गीतकार शैलेन्द्र ने लिखा था। यह फिल्म 1955 में रिलीज हुई थी और यह गीत लोगों की जुबान पर चढ़ गया था ।

देश की आजादी के बाद का वक्त था, यहां कुछ भी तो नहीं बना करता था सब कुछ विदेशी ही था ।अंग्रेज हमारे लघु उद्योगों ,कुटीर उद्योगों ,कला को पहले ही ध्वस्त कर चुके थे ,अंग्रेजों के राज में सभी कुछ इंगलिस्तान से ही आया करता था। सभी उत्पादों के बाजार पर विदेशी कम्पनियों का कब्जा था ।उपयुक्त गीत की चर्चा इसलिए करी कि उस गीत में विदेशी वस्तुओं का जिक्र है लेकिन हिंदुस्तानी होने का जो जज्बा है उसी जज्बे ने आजादी के बाद देश को अपने पैरों पर खड़े होने के लिए ,अपनी जरूरतों का सामान यहीं पर बनाने के लिए अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति अपने बलबूते पर पूरा करने के लिए प्रेरित कर दिया और हिंदुस्तान के हिंदुस्तानियों ने यह कर के भी दिखाया है।

होंगे राजे राजकुंवर हम बिगड़े दिल शहजादे
सिंघासन तक जा पहुंचे हम जो करें इरादे, हम जो करें इरादे –
हम एक बार फिर से उठ खड़े होंगे ,कड़ी मेहनत और पक्के इरादे से हम अपनी उस मंजिल की ओर बढ़ेंगे ,ताकि हमें हमें अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विदेशों की ओर ना ताकना ,आत्म -निर्भरता और स्वावलंबन के पीछे का मकसद यही है ।इस तरह की बातें जुबानी जमा खर्च करके नहीं दिखानी चाहिए बल्कि कर के दिखानी चाहिए। आखिर महात्मा गांधी ने चरखा क्यो चलाया था स्वयं आधी धोती क्यों पहनी थी इसे नहीं भूलना चाहिए ।

अगर हम आत्म निर्भरता और स्वावलंबन की बात करते हैं तो फिर
साला मैं तो साहब बन गया ,साहब बनके कैसा तन गया
ये बूट मेरा देखो ,ये सूट मेरा देखो जैसे छोरा कोई लंदन का ,इस तरह की प्रवृति से बचना होगा ,इसे तिलांजलि देनी होगी और कहना और लगने के साथ दिखना होगा कि हम हैं हिंदुस्तानी ।

अनिल पाण्डेय – रायगढ़