शांत हो गया वनांचल की सियासत का सूरमा.. अंचल मे शोक की लहर !पूर्व मंत्री चनेशराम राठिया का अवसान एक राजनैतिक युग का अंत..!

  • कोविड गाईडलाईन का पालन करते हुये गृहग्राम मे अंतिम संस्कार श्रद्धांजलि देने उमड़े लोग

रायगढ़, 14 सितम्बर। जिले के धुर आदिवासी क्षेत्र धरमजयगढ मे पहले शिक्षा फिर राजनीति के माध्यम से वनवासी आबादी को समाज की मुख्यधारा मे लाने वाले जन जन के चहेते राजनेता व पूर्व मंत्री चनेशराम राठिया का 13 सितंबर की रात निधन हो गया। 78 वर्षीय चनेशराम राठिया बीते कुछ वक्त से अस्वस्थ चल रहे थे। इसी बीच शनिवार को तकलीफ बढने पर उन्हे जिला मुख्यालय स्थित फोर्टिस हॉस्पिटल मे एडमिट कराया गया था। जहां जांच मे उनमे कोरोना के लक्षणों की पुष्टि हुई थी। ईलाज के दौरान ही पूर्व मंत्री के अवसान की सूचना जैसे ही क्षेत्र मे फैली,समूचे धरमजयगढ़ मे मातम पसर गया। करीब 3 दशकों तक वनांचल की लगभग 3 लाख आबादी के सुख-दुख के  फिक्रमंद रहे चनेशराम के निधन की खबर पाकर उनके बोकरामुडा स्थित निवास छाल आश्रम पर लोगों की भीड़ उमड़  पड़ी। सोमवार सुबह 11 बजे के लगभग कोविड गाईडलाईन के अनुरुप राठिया की मृत काया पंचतत्व मे विलीन हो गई ।

30 वर्ष की आयु में लड़ा पहला चुनाव

वर्ष 1942 मे धरमजयगढ़ के बोकरामुडा गांव मे एक सामान्य परिवार मे जन्मे चनेशराम राठिया ने अपने कैरियर की शुरुआत वर्ष 1975 में एक शिक्षक के तौर पर की थी किंतु जल्दी ही उन्हे समझ आ गया कि आदिवासियों के उत्थान के लिए लोकतंत्र की सबसे बडी पंचायत में समाज की भागीदारी आवश्यक है। वनवासियों को समाज की मुख्य धारा से जोडने का संकल्प लेकर वर्ष 1975 मे मात्र 30 वर्ष की आयु मे चनेशराम राठिया ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर पहला विधानसभा चुनाव लडा। हांलांकि इसमे उन्हे सफलता नहीं  मिली किंतु अविभाजित मध्यप्रदेश की तत्कालीन सियासत मे यह बात जंगल मे आग की तरह फैल गई कि कोई आदिवासी चेहरा पूरी ताकत के साथ राजनीति के मानचित्र पर उभर रहा है। जहां उस दौर के नेताओं की नजर मे चनेशराम राठिया एक बडी चुनौती के रुप मे चर्चित हो रहे थे तो इधर चुनाव मे पराजय के बावजूद आदिवासी वर्ग मे चनेशराम की पैठ मजबूत हो रही थी। दो साल बाद ही वर्ष 1977 मे चनेशराम राठिया को कांग्रेस की टिकट देकर विधानसभा चुनाव मे उतारा गया और यहां से शुरु हुआ उनका सियासी सफर।साल 2013 मे अपने सुपुत्र लालजीत राठिया को विरासत सौंपने के साथ आ कार ठहरा। करीब तीन दशकों के राजनैतिक सफर मे वनांचल के अजेय योद्धा और आदिवासियों के सच्चे सेवक चनेशराम राठिया अविभाजित मध्यप्रदेश से लेकर  पृथक  छत्तीसगढ़ गठन तक 6 बार निर्वाचित होकर विधानसभा पंहुचे और खाद्य ,लोक निर्माण व धर्मस्व जैसे अहम विभागों मे मंत्री  रहे।अपने हौंसले और जिद की वजह से चनेशराम राठिया आदिवासी अंचल मे सियासत के सूरमा माने जाते रहे। वनांचल ही सदैव उनकी कर्मभूमि रही और उनका पूरा जीवन आदिवासियों के उत्थान को समर्पित था। एक दौर मे चनेशराम राठिया  आदिवासी राजनीति के सिकंदर माने जाते थे।वनवासियों और आदिवासियों के बीच चनेशराम कुछ इस तरह लोकप्रिय और भरोसेमंद हुये कि स्थानीय आबादी ने न केवल उन्हे अपना रहनुमा मान लिया था बल्कि राठिया की बातें और सीख धरमजयगढ़ की जनता का आदर्श बन गये थे।

बेटे को सौंपा राजनैतिक उत्तराधिकार

30 सालों तक सक्रिय राजनीति का हिस्सा रहे आदिवासी जनजाति के रहनुमा चनेशराम राठिया ने वर्ष 2013 मे अपनी राजनीतिक विरासत अपने सुपुत्र लालजीत राठिया को सौंपकर सियासत से औपचारिक सन्यास ले लिया। पिता की स्वच्छ और कद्दावर छवि का लाभ लालजीत को भी भरपूर मिला और विगत दो पंचवर्षीय से लालजीत राठिया धरमजयगढ़ के विधायक चुनकर आ रहे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने लालजीत को आदिवासी विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष भी नियुक्त किया है। पिता के नेत्रों के सामने ही उनकी अपेक्षा पर खरा उतर कर अपनी राजनैतिक दक्षता साबित करते हुये लालजीत राठिया ने जहां पिता के अजेय रथ को आगे बढाने का सिलसिला जारी रखा है वहीं चनेशराम राठिया ने भी लालजीत की कई बार मुक्त कंठ से प्रशंसा की थी। इन सब बातों को याद कर पूर्व मंत्री के विधायक पुत्र पिता के विछोह मे गमगीन नजर आये।

सीएम बघेल ने दी श्रद्धांजलि

चनेशराम राठिया के अवसान की सूचना पाकर जहां धरमजयगढ़ समेत जिले भर मे कांग्रेस संगठनों एवं राठिया समर्थको का जमावडा उनके अंतिम दर्शन हेतु गृहग्राम बोकरामुडा मे लगते देखा गया वहीं सोशल मीडिया पर भी राठिया को नमन करने का सिलसिला पूरे दिन जारी रहा। जिले मे जगह जगह चनेशराम के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि दी गई तो प्रदेश के मुखिया भूपेश बघेल ने भी ट्वीटर पर कर्मठ आदिवासी नेता चनेशराम राठिया को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुये आत्मशांति की प्रार्थना की। सीएम भूपेश ने राठिया के अवसान को राजनीति के एक युग का अंत बताया।