“लेखनी की नूर” पत्रकारों की लेखनी को इंगित करते इस कविता का आप भी लुत्फ उठाइए


रायगढ़ 12 अक्टूबर 2020:- आज के स्वरूप में पत्रकारों का समाज के प्रति जिम्मेदारी काफी बढ़ गई है। पत्रकार ही समाज आईना होता है जो देश, समाज के हालातों को अपनी लेखनी के माध्यम से सबके बीच प्रगट करता है, लेकिन आज के दौर की पत्रकारिता चाटूकारिता का रूप धारण करने से गुरेज नहीं करती। इन्हीं सब मुद्दों को रायगढ़ के उभरते हुए कवि जयलाल कलेत ने अपनी कविता में ढाला है। चलिए हम भी उनकी कविता को पढ़ें।

लेखनी की नूर

उनकी तरह घड़ियाली आंसू मत रोना,
लेखनी तुम अपनी, नूर मत खोना,

पेचीदा है यहां की सियासत,
तुम फिदा उन पर मत होना,
लेखनी तुम अपनी, नूर मत खोना।

ज़ुल्म के डगर में ये चल पड़े है,
तुम अपनी ईमान से जुदा मत होना,
लेखनी तुम अपनी नूर मत खोना।

सहज है सच को दफनाना यहां पर,
सियासी हलचल का शिकार मत होना,
लेखनी तुम अपनी नूर मत खोना।

उठाएंगे बुरी निगाहें लोग तुम पर,
पर अपनी वसूल से मजबूर मत होना,
लेखनी तुम अपनी नूर मत खोना।

ये पर्दे डालेंगे अपनी करतूतों पर,
पर हकीकत को हकीकत लिख देना,
लेखनी तुम अपनी नूर मत खोना।

खोई है ज़िगर के टुकड़े उस आंचल ने,
उन आंसुओं की सच्ची कहानी लिख देना,
लेखनी तुम अपनी नूर मत खोना।

लोग बिक रहें हैं,आगे भी बिकते रहेंगे,
पर अपराधी को अपराधी लिख देना,
लेखनी तुम अपनी नूर मत खोना।

जयलाल कलेत
रायगढ़ छत्तीसगढ़