अबूझमाड़ का जंगली इलाका और दुर्गम हांदावाड़ा जलप्रपात का वह नन्हा गाइड “मनकू”


बस्तर 18 सितंबर 2020:- ओ मनकू, झरने तक साथ चलोगे क्या? ‘जे! मनकू ने जवाब दिया। रास्ते में कुछ खाने-पीने की बात पूछने पर भी वह हां के तौर पर ‘जे ही बोलता है। हांदावाड़ा गांव से चलकर अबूझमाड़ के घने जंगलों के बीच होते हुए जलप्रपात तक पहुंचने, वहां घंटा भर रुकने और फिर वापस लौटने तक के करीब पांच घंटे के सफर में मनकू की निशब्द-सी जुबान बस ‘जे ही बोल पाती है। तीन-चार दिन पहले गांव में पत्थर से चोटिल होने के चलते उसके एक पैर में गहरा जख्म है। फिर भी उसके कदम लड़खड़ाते हैं न थमते हैं। अबूझमाड़ के जंगल ब्वॉय चेंदरू या फिर मोगली की तरह कूदते-फांदते, झाड़ियों और पगडंडियों को नापते हुए वह हम सबसे आगे चलता ही चला जाता है।

आखिर वह इस अनजान डगर का हमारा गाइड (पथ-प्रदर्शक) जो ठहरा। सवाल है कि मनकू की जुबान ‘जे तक ही क्यों ठहरी हुई है? हिंदी भाषी राज्य का यह बच्चा अपनी मातृभाषा से अनभिज्ञ क्यों है? उसके जख्मी पैरों में जूते और तन पर ढंग के कपड़े क्यों नहीं हैं? वह केक या कोल्ड ड्रिंक जैसी सामान्य चीजों को विस्मित नेत्रों से क्यों निहारता है? हमारा धूप का चश्मा पहनकर उसका मन मयूर की तरह क्यों नाचने लगता है? बड़ा सवाल है कि आखिर मनकू ऐसी कौन सी दुनिया में रहता है कि ये मामूली चीजें भी उसके लिए खास हैं?

इन गुत्थियों को समझने के लिए आपको अबूझमाड़ के रहस्यमय जंगलों में स्थित हांदावाडा जलप्रपात (झरना) तक के दुर्गम सफर पर चलना होगा। प्रकृति की अप्रतिम सुंदरता ओढ़े और दुनिया की नजरों से करीब-करीब ओझल यह झरना बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले के ओरछा ब्लॉक में पड़ता है। करीब छह साल पहले इस झरने पर फिल्म बाहुबली की शूटिंग की चर्चाएं चलीं थीं। हालांकि ऐसा कुछ हुआ नहीं। जो भी हो, आज भी यह पूरा इलाका अबूझमाड़ के रहस्यमय अंधेरों में गुम है। झरने से करीब चार-पांच किलोमीटर पहले हांदावाड़ा गांव है। यहां से ब्लॉक मुख्यालय ओरछा 66 तो पड़ोसी जिला दंतेवाड़ा करीब 60 किलोमीटर दूर है। यह दूरी कोई सड़क मार्ग की नहीं है। यहां तक पहुंचने के लिए आपको घने जंगल, नदी-नाले, दलदल, चट्टान, पेड़ और कंटीली झाड़ियों के बीच फिसलन भरी ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों, उन पर दौड़ते और डराते रंग-बिरंगे गिरगिट, दरख्तों के कोटरों के आसपास विषधरों की बांबियां, मलेरिया के भिनभिनाते जहरीले मच्छरों जैसी दुश्वारियों से पार पाना होता है। फिर गांव पहुंचकर भी आपको गांव जैसा अहसास शायद ही हो। एक झोपड़ी यहां तो दूसरी पांच-सात सौ मीटर दूर। फिर तीसरी इससे भी दूर। दूरियों, दरख्तों और पगडंडियों का एक अंतहीन सिलसिला। बिजली न पानी, स्कूल न अस्पताल, हाट न बाजार; बस, सघन वन और उसके अबूझ रास्ते, अबाध विचरते वन्यजीव और इन सबके बीच रहने को अभ्यस्त या अभिशप्त आदिम समाज के बेजुबान बाशिंदे।

ऐसा भी नहीं है कि हांदावाड़ा या अबूझमाड़ क्षेत्र के आदिवासी गांवों के हाल से शासन-प्रशासन बेखबर है। दरअसल, इन इलाकों से संपर्क स्थापित करने या इसे मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयत्न अब तक सधो मन से हुआ ही नहीं है। दंतेवाड़ा के बारसूर ब्लॉक से दस किलोमीटर दूर इंद्रावती नदी पर बड़ा पुल, फिर रास्ते में माडरी नाले पर सौ मीटर का छोटा पुल और फिर आगे हांदावाड़ा तक सड़क बनाना कोई चांद तक सीढ़ी बनाने जैसा असंभव काम भी नहीं है। हमने हिमालय की दुर्गम चोटियों पर हवाई अड्डे और पहाड़ को चीरकर दस किलोमीटर की सुरंग तक बना डाली हैं। चूंकि बस्तर संभाग में कभी इस तरह की कोशिशें हुईं नहीं हैं, इसलिए यह इलाका न सिर्फ अबूझ और रहस्यमय बना हुआ है, बल्कि नक्सलवाद के फलने-फूलने का बहुत बड़ा कारण भी है। मुख्यधारा से पूरी तरह कटे हुए आदिम समाज के ये निरीह बाशिंदे नक्सलियों के रहमो-करम पर जीने को विवश हैं। नौ साल का मनकू जब अबोध था तो उसके सिर से पिता का साया उठ गया। मुखबिरी के आरोप में नक्सलियों ने उसे सरेआम मार डाला था। नक्सली ऐसी नृशंस वारदातों को इसलिए अंजाम देते हैं, ताकि पुलिस-प्रशासन की पहुंच से दूर इन भोले-भाले आदिवासियों के मन में उनका खौफ बना रहे। बिजली नहीं है, इसलिए अंधेरे को इन्होंने अपनी नियति मान लिया है। मनकू जैसे तमाम बच्चों के लिए गांव में झोपड़ीनुमा एक स्कूल (आश्रम) है, जिसमें बस्तर का भविष्य सिसक रहा है।

पांचवीं कक्षा में पढ़ रहे मनकू के हिंदी ज्ञान का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह अभी तक ‘जी को ‘जे ही उच्चारित करता है। यहां कभी डॉक्टर नहीं जाते, इसलिए बीमारियां बैगा-गुनिया की झाड़-फूंक में मौत का तमाशा करती हैं। इलाके के लोग विकास के तमाम पहलुओं से अनभिज्ञ हैं, अनछुए हैं, कोरे कागज जैसे हैं। शायद इसलिए शहर से आने वालों को ये कौतुहल और उम्मीद भरी निगाहों से देखते हैं। ये दारुण परिस्थितियां खूबसूरत झरने को निहारने से मिले आनंद को अवसाद में बदल देती हैं। मनकू पर तरस से ज्यादा व्यवस्था से वितृष्णा होने लगती है। खैर, हमने पूरे रास्ते मनकू को खूब खिलाया-पिलाया। ‘जे की जगह जी कहने का अभ्यास कराया। जाते-जाते उसे जूते व कपड़े खरीदने के लिए कुछ पैसे दिए। साथ में खूब फोटो भी खिंचवाए। हांदावाड़ा छोड़ते समय वह सूनी निगाहों से हमें तब तक निहारता रहा, जब तक हम उसकी आंखों से ओझल नहीं हो गए।